गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

कस्तूरबा गांधी

आज कस्तूरबा गांधी की पुण्यतिथि है-

जीवनगाथा
‘‘बा का जबर्दस्त गुण था-सहज ही मुझमें समा जाना। मैं नहीं जानता था कि यह गुण उनमें छिपा हुआ है। लेकिन जैसे-जैसे मेरा सार्वजनिक जीवन उज्जवल बनता गया, वैसे-वैसे बा खिलती गईं और पुख्ता विचारों के साथ मुझमें यानी मेरे काम में समाती गईं।’’

-महात्मा गांधी

कहा गया कि ‘हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है’, यह बात कस्तूरबा पर अक्षरश: सत्य सिद्ध होती है। गांधीजी को महात्मा बनाने में बा का बहुत बड़ा हाथ था। गांधी जैसे कठोर, निरंकुश, अनुशासनप्रिय, हठी और असामान्य व्यक्ति के साथ बा ने कदम-कदम पर समझौता किया और उनकी प्रत्येक अच्छी-बुरी बात को शिरोधार्य किया। स्वयं बापू ने कहा था-‘‘बा ही है, जो इतना सहन करती है। मेरे जैसे आदमी के साथ जीवन बिताना बड़ा कठिन काम है। इनके अलावा कोई और होता तो मेरा निर्वाह होना कठिन था।

जन्म

दया, करुणा और ममता की मूर्ति कस्तूरबा का जन्म गुजरात के पोरबंदर नगर में 11 अप्रैल, 1869 को हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुलदास मकनजी था जो एक साधारण व्यापारी थे। माता ब्रजकुँवर एक आदर्श गृहस्थ महिला थीं।
बा के परिवार में माता-पिता के अलावा तीन भाई और एक बहन और भी थे; इनमें दो सगे भाई और एक बहन जल्दी ही काल-कवलित हो गए। बाकी बचे कस्तूरबा और छोटे भाई माधवदास।

शिक्षा

बा के माता-पिता वैष्णव धर्मावलंबी थे। अत: अच्छे संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे। एक कमी थी, निरक्षर रहने की, जो उन्हें जीवन भर सालती रही। गांधीजी भी इसके लिए उन्हें जीवन भर उपालंभ देते रहे।
तत्कालीन समाज में गुजरात के कठियावाड़ इलाके में लड़कियों को पढ़ाने का चलन नहीं था, यही कारण था कि बा को भी नहीं पढ़ाया गया और वे निरक्षर रह गईं। बाद में गांधीजी ने स्वयं उन्हें पढ़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। बा के पिता गोकुलदास मकनजी गांधीजी के पिता करमचंद यानी ‘काबा’ गांधी के मित्र थे। इस मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने के लिए दोनों परिवारों ने बा और मोहनदास का विवाह करने का निश्चय किया।
उन दिनों सौराष्ट्र के साथ-साथ भारत के अनेक भागों में कम उम्र में विवाह कर देने की परंपरा थी। अत: मात्र सात वर्ष की आयु में बा और मोहनदास की सगाई कर देने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। बा अपने भावी पति मोहनदास से लगभग छह महीने बड़ी थीं। बाद में सन् 1883 में, तेरह वर्ष का आयु में दोनों का विवाह कर दिया गया। सगाई और विवाह तब दोनों को पर्व-त्योहार की तरह ही लगे थे। गांधीजी ने स्वयं अपनी आत्मकथा में इसकी चर्चा करते हुए लिखा है-‘‘मुझे याद नहीं पड़ता कि सगाई के समय मुझसे कुछ कहा गया था। इसी तरह विवाह के समय भी कुछ नहीं पूछा गया। सिर्फ तैयारियों से पता चला कि विवाह होने वाला है। उस समय तो अच्छे-अच्छे कपड़े पहनेंगे, बाजे बजेंगे, बारात निकलेगी, अच्छा-अच्छा खाने को मिलेगा, एक नई लड़की के साथ हँसी-खेल करेंगे, वगैरह इच्छाओं के सिवा और कोई विशेष भाव मेरे मन में रहा हो, ऐसा याद नहीं आता। उस समय तो सबकुछ ठीक और मनभावन लग रहा था। मैं खुद शादी करने को उत्सुक था।’’

विवाह के बाद गांधी भरसक प्रयत्न करते थे कि बा अधिकतर समय उन्हीं के साथ गुजारें, लेकिन उनके भरे-पूरे परिवार और तत्कालीन रूढ़िवादी परंपराओं में यह संभव नहीं हो पाता था। उन्हें रात्रि के समय ही साथ रहने का अवसर मिल पाता था। इस व्यथा का वर्णन करते हुए गांधीजी ने लिखा है-‘‘मुझे अपनी पत्नी को आदर्श स्त्री बनाना था। वह साफ बने, साफ रहे, मैं जो सीखूँ, सीखे; मैं जो पढ़ूँ, पढ़े और हम दोनों एक-दूसरे में ओत-प्रोत रहें; यह मेरी भावना थी, वे निरक्षर थीं, स्वभाव की सीधी, स्वतंत्र, मेहनती और मेरे साथ कम बोलनेवालीं। उन्हें अपने अज्ञान पर असंतोष नहीं था। मैंने अपने बचपन में उनको कभी यह इच्छा करते हुए नहीं पाया कि जिस तरह मैं पढ़ता हूँ, उस तरह वह खुद भी पढ़ें तो अच्छा हो। उन्हें पढ़ाने कि मेरी बड़ी इच्छा थी, लेकिन उसमें दो कठिनाइयाँ थी-एक तो बा की पढ़ने की भूख खुली नहीं थी; दूसरे बा अनुकूल हो जातीं तो भी उस जमाने के भरे-पूरे परिवार में इस इच्छा को पूरा करना आसान नहीं था।’’

इस प्रकार बा को पढ़ाने की गांधीजी की इच्छा कभी मूर्त रूप नहीं ले सकी। इस मानसिक द्वंद्व का वर्णन करते हुए गांधीजी ने लिखा है-‘‘एक तो मुझे जबर्दस्ती पढ़ाना था और वह भी रात्रि के एकांत में हो सकता था। घर के बड़े-बूढ़ों के सामने पत्नी की तरफ देख तक नहीं सकते थे। बातें तो हो ही कैसे सकती थीं। उस समय काठियावाड़ में घूँघट निकालने का निरर्थक और अंधविश्वासी रिवाज था। आज भी बहुत-कुछ मौजूद है। इसलिए पढ़ाने के अवसर भी मेरे लिए प्रतिकूल थे। अतएव मुझे कबूल करना चाहिए कि जवानी में मैंने बा को पढ़ाने की जितनी भी कोशिशें कीं, वे सब करीब-करीब बेकार गईं। जब मैं ‘विषय’ की नींद से जागा, तब सार्वजनिक जीवन में पड़ चुका था, इसलिए मेरी स्थिति ऐसी नहीं रह गई थी कि मैं ज्यादा समय दे सकूँ। शिक्षक के जरिए पढ़ाने की मेरी कोशिशें भी बेकार हुईं। नतीजा यह हुआ कि आज कस्तूरबा मुश्किल से पत्र लिख सकती हैं और मामूली गुजराती समझ लेती हैं। मैं मानता हूँ कि मेरा प्रेम विषय से दूषित न होता, तो आज वे विदुषी स्त्री होतीं। उनके पढ़ने के आलस्य को मैं जीत सकता।


बा का गृहस्थ जीवन

‘‘जो लोग मेरे और बा के निकट संपर्क में आए हैं उनमें अधिक संख्या तो ऐसे लोगों की है, जो मेरी अपेक्षा बा पर अनेक गुनी अधिक श्रद्धा रखते हैं।

-महात्मा गांधी

बा का गृहस्थ जीवन कांटों के ताज जैसा था। गांधीजी उनकी निरक्षरता से कुढ़ते रहते थे और उन्हें ताने देते रहते थे। उनका सजना, सँवरना और घर से बाहर निकलना भी उन्हें नापसंद था। वे शक्की और ईर्ष्यालु पति थे। इस बात को उन्होंने भी स्वीकार किया था।
बा की सास पुतलीबाई का उनपर विशेष स्नेह था। बा की कर्मठता के कारण जल्दी ही परिवार के पूरे कामकाज का बोझ उनपर आ गया। अब पति के लिए और भी कम समय मिल पाता था। ससुरजी बीमार रहने लगे थे, अत: सासूजी का अधिकतर समय उनकी सेवा में बीत जाता था।

लंबी बीमारी के बाद ससुरजी के चल बसने के कारण बा पर काम का और अधिक बोझ आ गया। उन्हें अपनी माता के शब्द याद आ जाते थे कि ‘ससुराल में काम करते-करते कमर टेढ़ी हो जाएगी।’
इसी बीच शारीरिक कमजोरी के कारण उनका पहला शिशु जन्म लेते ही स्वर्ग सिधार गया। बा की जान भी मुश्किल से बच पाई। उनकी इस व्यथा को बाँटने वाला कोई नहीं था। वे रात्रि में चुपचाप आंसू बहातीं और दिन में घर-गृहस्थी के काम-काज में व्यस्त रहकर समय गुजारतीं।

विवाह के आरंभिक काल में बा और बापू में नादानी भरे झगड़े होते रहते थे। दोनों में ‘कुट्टी’ हो जाती थी। कई-कई दिनों तक दोनों बात नहीं करते थे।
एक दिन बापू ने एक निबंध में पढ़ा कि एकपत्नी-व्रत का पालन करना पति का धर्म है। यह बात उनके मन में गहरे उतर गई। लेकिन इसके साथ ही यह विचार भी मन में पैदा हुआ कि यदि पति एकपत्नी-व्रत का पालन करता है तो उसकी पत्नी को भी एकपति-व्रत का पालन करना चाहिए। इस विचार ने गांधीजी को एक ईर्ष्यालु पति बना दिया। ‘पालना चाहिए’ पर से वे ‘पलवाना चाहिए’ के विचार पर पहुँच गए।

गांधीजी ने इस विषय में लिखा है-‘‘जब मैं ‘पलवाना है’ के निष्कर्ष पर पहुँचा तो पत्नी के ऊपर निगरानी रखनी चाहिए-इस विचार पर पहुँचा। पत्नी की पतिव्रता पर शक करने का मेरे पास कोई कारण न था, लेकिन ईर्ष्या कब कारण देखने बैठती है ? मुझे यह जानना चाहिए कि मेरी पत्नी कहाँ जाती है। इसलिए मेरी अनुमति के बिना वह कहीं जा ही नहीं सकती। यह चीज हमारे बीच दु:खद झगड़े का कारण बन गई। अनुमति के बिना कहीं न जा सकना तो एक तरह की कैद हुई। लेकिन कस्तूरबा इस तरह की कैद सहन करनेवाली थीं ही नहीं। जहाँ जाना चाहतीं, वहाँ मुझसे बिना पूछे जरूर जातीं। जितना ही मैं दबाता, उतना ही अधिक वे आजादी पा लेतीं और मैं ज्यादा चिढ़ता।’’

विवाह के आरंभिक काल में पुरुषों को प्राय: अपनी महत्ता और स्वामित्व सिद्ध करने का जोश चढ़ा रहता है, लेकिन स्त्रियाँ स्वभाव से ही सहनशील और धैर्य की प्रतिमूर्ति होती हैं। उनके इन्हीं गुणों के कारण गृहस्थी का जहाज टकराने से बचा रहता है। बापू स्वयं इस बात को स्वीकार करते हुए अपनी आत्मकथा में लिखते हैं-‘‘कस्तूरबा ने जो आजादी ली थी, उसे मैं निर्दोष मानता हूँ। एक बालिका, जिसके मन में पाप नहीं, वह मंदिर जाने के लिए या किसी से मिलने जाने के बारे में ऐसा दबाव क्यों सहन करे ? अगर मैं उस पर दबाव रखता हूँ तो वह मुझ पर क्यों न रखे ? किंतु यह तो अब समझ में आता है।

निरक्षर होने के बावजूद बा में अच्छे-बुरे को पहचानने की विवेक-शक्ति थी। बुराई का वे डटकर सामना करती थीं और गांधीजी को चेतावनी देने से भी नहीं चूकती थीं। एक बार जब गलत मित्रों की संगत में गांधीजी मांस आदि का सेवन करने लगे तो बा चुप न रह सकीं, बल्कि उन्होंने बापू के अंत:करण को जगाने के लिए जमाने की भलाई-बुराई पर विस्तार से चर्चा की और चेतावनी देते हुए कहा कि यह सब करना उनके और उनके खानदान के लिए उचित नहीं है।
बाद में बापू ने उनकी समझदारी को स्वीकार करते हुए लिखा-‘‘पत्नी की चेतावनी को मैं गर्विष्ठ (घमंडी) पति भला क्यों मानने लगा।

‘‘बा में एक गुण बहुत मात्रा में है, जो दूसरी बहुत-सी हिंदू स्त्रियों में न्यूनाधिक मात्रा में पाया जाता है। इच्छा से हो या अनिच्छा से, ज्ञान से हो या अज्ञान से, मेरे पीछे चलने में उन्होंने अपने जीवन की सार्थकता मानी है। और शुद्ध जीवन बिताने के लिए मेरे प्रयत्न में मुझे कभी रोका नहीं। इसके कारण हमारी बुद्धि, शक्ति में बहुत अंतर होते हुए भी मुझे यह लगा कि हमारा जीवन संतोषी, सुखी और ऊर्ध्वगामी है।

-महात्मा गांधी

बा के ससुर कमरचंद गांधी के निधन के बाद उनकी सास पुतलीबाई का मन दुनिया से विरक्त हो गया था। पति-वियोग ने उन्हें धीर-गंभीर बना दिया था। पत्नी पुतलीबाई अपने पति के निधन से चिंताग्रस्त थीं तो कस्तूरबा अपने पति के कार्य-कलाप से।
गांधीजी ने हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। उनके भविष्य को लेकर बड़े-बूढ़े विचार करने लगे कि उन्हें क्या बनाया जाए। अंत में, उनके मामा और बड़े भाई आदि ने निर्णय लिया कि उन्हें बैरिस्टर बनाया जाए।
बैरिस्टर की पढाई के लिए उन दिनों इंग्लैंड जाना पड़ता था। यह निर्णय सुनकर मोहनदास बहुत खुश हुए। उनकी यह अभिलाषा भी थी कि बड़े आदमी बनकर नाम कमाएँ।

दुखी और चिंतित थीं तो केवल कस्तूरबाई। उन्हें चिंता थी कि देश में ही इतने अंकुश के बावजूद वे (गांधी) गलत सोहबत में पड़ गए, मांस आदि खाने लगे और कर्ज चुकाने के लिए सोने के कड़े का टुकड़ा काटकर बेचने की बात उन्होंने स्वयं सबके सामने स्वीकार की। उधर, विदेश में न कोई देखनेवाला होगा, न सुननेवाला, कोई अंकुश भी नहीं होगा। वहाँ पता नहीं, वे संयमित रह पाएँगे कि नहीं ? इसी चिंता ने कस्तूरबाई (कस्तूरबा) को आधा कर दिया था। परंतु उनके मन की बात सुननेवाला कोई नहीं था।
सास पुतलीबाई हालाँकि संसार से विरक्त महिला थीं, अधिकतर धर्म-कर्म में डूबी रहती थीं, तथापि बहू के चेहरे पर खिंची चिंता की लकीरें उनसे छिप न सकी।

एक दिन प्रात: पुतलीबाई पूजागृह में थीं। तभी मोहनदास भगवान् को प्रणाम करने वहाँ पहुँचे तो उन्होंने उन्हें रोक लिया।
‘‘मोहन बेटा ! जरा इधर तो आ।’
‘‘हाँ, माँ !’’ यह कहकर मोहनदास माँ के सामने बैठ गए।
‘‘सुना है, वकालत पढ़ने तू इंग्लैड जा रहा है ?’’
‘‘आप बड़े यह निर्णय लें और अनुमति दें तो ऐसा करने में मुझे प्रसन्नता होगी।’’
‘‘वहाँ जाकर क्या भला आदमी बना जा सकता है ?’’
‘‘जी माँ, वहाँ की परीक्षा में पास होकर खूब मान-प्रतिष्ठा अर्जित की जा सकती है। अच्छा काम मिल सकता है। हमारे परिवार के दिन फिर सकते हैं।’’

‘‘अगर, तू ऐसा समझता है तो जा।’’ पुतलीबाई विरक्ति के स्वर में कह रही थीं, ‘‘लेकिन विदेश में भी अपने खानदानी वैष्णवी संस्कार मत छोड़ना। परायी स्त्री का साथ मत करना, मांस-मदिरा को मत छूना। तुझे मेरी कसम है।’’
पास के कमरे में बैठी कस्तूरबाई सब सुन रही थीं। उन्हें खुशी थी कि उनकी सास ने उनके मन की बातों को उनते पति के सामने रख दिया था। उन्होंने अपने ईश्वर को धन्यवाद दिया और पति के सुखद भविष्य की कामना की।
4 सितंबर, 1888 को मोहनदास इंग्लैड रवाना हो गए। उस समय बा 19 वर्ष की थीं। जाते समय उन्होंने सबसे विदाई ली, लेकिन बा से मिले अथवा नहीं, इसका विवरण कहीं नहीं मिलता। इतना तो तय है कि बिना मिले जाना बा को अच्छा नहीं लगा होगा या अधिक-से-अधिक बा ने पूछा होगा, ‘वापस कब आओगे’ और बापू ने कुछ आश्वासन दिया होगा।
मोहनदास जब इंग्लैड में वकालत पढ़ रहे थे तभी उनकी माता पुतलीबाई का निधन हो गया। बा का जीवन भारी दायित्व और व्यस्तता में गुम हो गया। उनकी जेठानी घंटों पूजा-पाठ में व्यस्त रहती थीं। अत: उनके बच्चों को नहलाना-धुलाना, उन्हें तैयार करके स्कूल भेजना, खाना बनाना, कपड़े धोना आदि कार्यों में दिन कब गुजर जाता था, बा को पता ही नहीं चलता था।
बा का अपना एक शिशु तो जन्म के दो-चार दिन बाद ही चल बसा था। उसके बाद गाँधीजी के इंग्लैड जाने से पूर्व हरिलाल का जन्म हुआ था। इस बालक के पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी बा पर थी।

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना



जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

--- गोपालदास 'नीरज'
(These information are copyright free)  

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

मेरी बात : परिचय का एक कारवां


प्रिय मित्रों और विद्‌यार्थियों,

आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है। यह ब्लॉग एक प्रयास है, जिसका उद्‌देश्य शिक्षक और विद्‌यार्थियों के मध्य एक सेतु बनाकर, कक्षा-शिक्षण को आधुनिक तकनीक के उपयोग द्‌वारा समाज और संस्कृति से जोड़ना है, जहाँ प्रत्येक विद्‌यार्थी अपने विचारों को एक-दूसरे से साझा कर सके। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हमने अपनी कक्षाओं को ज्ञान की प्रयोगशालाओं में परिवर्तित करने की कोशिश किया है ताकि हमारे ज्ञान, अनुभव और कौशल का सम्पूर्ण विकास संभव हो सके। जीवन में ज्ञान प्राप्ति का महत्त्व तब बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जब हमारे चारों ओर अज्ञानता का अंधेरा घना हो, क्योंकि अज्ञानता के अंधेरे में मानव का विवेक और उसकी इनसानियत के खत्म हो जाने का खतरा अधिक बढ़ जाता है। मानव के जीवन में आने वाली हर कठिनाई का सामना बुद्‌धि-बल से किया जा सकता है, क्योंकि ज्ञान के द्‌वारा हममें साहस, धैर्य, आत्मबल और तर्क-शक्ति का विकास होता है। इनसान जब आदिमकाल में जंगलों में रहता था और सभ्यता से बहुत दूर था तब उसने अपने बुद्‌धि और कौशल का इस्तेमाल कर आग, पहिया, पशुपालन, खेती आदि का विकास करते हुए परिवार, समुदाय, समाज, गाँव और शहर तक का लम्बा किन्तु सफल सफर तय किया।इनसानी सभ्यता के इस यात्रा में उसके ज्ञान, बुद्‌धि, कौशल और तर्क-शक्ति ने भरपूर सहयोग दिया। आज हम विज्ञान के युग में हैं और तकनीक ने मानव जीवन को अत्यंत सहज और आरामदायक बना दिया है किन्तु इनसानी दिमाग ने आराम नहीं लिया है। वह हर नए दिन के साथ नए आविष्कारों की खोज में लगा हुआ है ताकि इनसानी जीवन को और ज्यादा सुखद और सुरक्षित बनाया जा सके। आज के शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सूचना और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ गया है। पुस्तक जहाँ पहले ज्ञान का प्रमाणिक स्रोत और संसाधन हुआ करता था आज वहाँ तकनीक के कई साधन मौजूद हैं। आज विद्‌यार्थी किताबों की श्याम-श्वेत दुनिया से बाहर निकलकर सूचना और तकनीक की रंग-बिरंगी दुनिया में पहुँच चुका है, जहाँ माउस के एक क्लिक पर उसे दुनिया भर की जानकारी दृश्य रूप में प्राप्त हो जाती है। एक शिक्षक होने के नाते यह हमारी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि हम समय के साथ खुद को ढालें और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सुचारू रूप से गतिशील बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक के साधनों का भरपूर प्रयोग करें।


ख़ूब पढ़ें, साझा करें।

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

मानसिक नक़्शा --- परीक्षा



परीक्षा कहानी 


1. दीवानी पद की परीक्षा
2. उम्मीदवार, जिन्होंने अपने चरित्र को झूठे रुप में बढ़ा - चढ़ा कर दिखाने की कोशिश की।
3. पद के लिए आवश्यक दक्षता साहस, आत्मबल, दूसरों के प्रति दया की भावना, कर्त्तव्यपरायणता और उदारता हो तय।
4. दीवानी पं० जानकीनाथ को ही प्राप्त हुई, क्योंकि उनमें दया एवं आत्मबल  आदि का प्राधान्य था।
5. अतः लेखक दीवानी पद की परीक्षा के लिए आवश्यक गुणों को बताकर पाठकों को नैतिक ज्ञान में सफल हुआ है।

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

अपठित गद्या़ंश अभ्यास

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए। उत्तर यथासंभव आपके अपने शब्दों में होने चाहिए -                                  
किसी अमीर के घर में एक दिन धुँआसा साफ करने के लिए एक मजदूर लड़के को बुलाया गया। लड़का सफाई करने लगा। वह जिस कमरे का धुँआसा उतार रहा था, उसमें तरह-तरह की सुंदर चीजें सजी रखी थीं। उन्हें देखने में उसे बड़ा मजा आ रहा था। उस समय वह अकेला ही था, इसलिए प्रत्येक चीज को उठा-उठा कर देख रहा था। इतने में उसे एक बड़ी सुंदर हीरे-मोतियों से जड़ी हुई सोने की घड़ी दिखाई दी। वह घड़ी को हाथ में उठाकर देखने लगा।
घड़ी की सुंदरता पर उसका मन लुभा गया। उसने कहा – ‘काश!  ऐसी घड़ी मेरे पास होती।’ उसके मन में पाप आ गया, उसे घड़ी चुराने का मन किया, परंतु दूसरे ही क्षण वह घबराकर चिल्ला उठा – ‘अरे रे! मेरे हृदय में यह कितना बड़ा पाप आ गया। चोरी करते हुए पकड़े जाने पर मेरी बहुत ज्यादा दुर्दशा होगी। जेल जाना पड़ेगा और लोग हिकारत की नज़र से मुझे देखेंगे। ईमान तो जायेगा ही लोग अपने घरों में घुसने तक न देंगे। मनुष्य पकड़े न पकड़े ईश्वर की नज़र तथा हाथ से तो कभी छूट नहीं सकता।’ यों कहते-कहते लड़के का चेहरा उतर गया, उसका शरीर पसीने-पसीने हो गया और वह काँपने लगा। वह सिर थामकर दीनभाव से जमीन पर बैठ गया। और आँखों से आँसुओं की धारा बह चली। कुछ समय बाद अपनी मानसिक स्थिति सामान्य हो जाने के बाद उसने घड़ी यथा स्थान रख दी। उसने जोर से कहा- ‘लालच बहुत ही बुरी चीज है। इसने ही मेरे मन को बिगाड़ा है, पर दयालु भगवान ने मुझको बचा लिया। लालच में फँसकर चोरी करने की अपेक्षा धर्म पर चलकर गरीब रहना बहुत अच्छा है।’ चोरी करने वाला कभी निर्भय होकर सुख की नींद नहीं सो सकता, चाहे वह कितना ही अमीर क्यों न हो। चोरी का मन होने पर जब इतना मानसिक क्लेश होता है तो चोरी कर लेने पर पता नहीं कितना भयानक कष्ट उठाना और दुख झेलना पड़ता।                                                                                                      
        क) मजदूर लड़के को क्यों बुलाया गया? उसे अपना काम करने में मजा क्यों आ रहा था?  
ख) उसके मन में कब और क्यों पाप आया?  
ग) वह क्यों चिल्ला उठा और उसने अपने आप से क्या कहा?
घ) उसने किसका धन्यवाद किया और क्यों?
        ङ) ‘लालच’ के संबंध में उसके क्या विचार थे?  


बुधवार, 28 सितंबर 2011

हिन्दी भाषा का उद्भव और उसका विकास

हिन्दी भाषा का उद्भव और उसका विकास

"हिन्दी" वस्तुत: फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है -- हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित। हिन्दी शब्द की निष्पत्ति सिन्धु -सिंध से हुई है, क्योंकि ईरानी भाषा में "स" को "ह" बोला जाता है। इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है। कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी "हिंद" से हिन्दी शब्द बना।
आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है,वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है,जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद,संहिता एवं उपनिषदों - वेदांत का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी,जिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है। अनुमानत: ८ वी.शताब्दी ई.पू.में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था। संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये। वाल्मीकि ,व्यास, कालिदास, अश्वघोष, भारवी, माघ, भवभूति, विशाख,मम्मट,दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है। इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है।
संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते ५०० ई.पू.के बाद तक काफ़ी बदल गई,जिसे "पालि" कहा गया। महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होंने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया। संभवत: यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई,तब इसे "प्राकृत" की संज्ञा दी गई। इसका काल पहली ई.से५०० ई.तक है। पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषायें- पश्चिमी,पूर्वी ,पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी ,अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी,जिन्हें मागधी,शौरसेनी,महाराष्ट्री,पैशाची,ब्राचड तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है।
आगे चलकर,प्राकृत भाषाओं के क्षेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषायें प्रतिष्ठित हुई। इनका समय ५०० ई.से१००० ई.तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यत: दो रूप मिलते है - पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानत: १००० ई.के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ। आधुनिक आर्य भाषाओं में,जिनमे हिन्दी भी है, का जन्म १००० ई.के आसपास ही हुआ था,किंतु उसमे साहित्य रचना का कार्य ११५० या इसके बाद प्रारम्भ हुआ। अनुमानत: तेरहवीं शताब्दी में हिन्दी भाषा में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ हुआ,यही कारण है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी को ग्राम्य अपभ्रंशों का रूप मानते है। आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है -
अपभ्रंश .................................................आधुनिक आर्य भाषा तथा उपभाषा
पैशाची ....................................................लहंदा ,पंजाबी
ब्राचड ......................................................सिन्धी
महाराष्ट्री ..................................................मराठी.
अर्धमागधी...............................................पूर्वी हिन्दी.
मागधी ....................................................बिहारी ,बंगला,उड़िया ,असमिया.
शौरसेनी ..................................................पश्चिमी हिन्दी,राजस्थानी ,पहाड़ी,गुजराती.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा का उद्भव ,अपभ्रंश के अर्धमागधी ,शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ है।



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भाषा, लिपि और व्याकरण

भाषा,लिपि और व्याकरण

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अपने विचार ,भावनाओं एवं अनुभुतियों को वह भाषा के माध्यम से ही व्यक्त करता है। मनुष्य कभी शब्दों ,कभी सिर हिलाने या संकेत द्वारा वह संप्रेषण का कार्य करता है। किंतु भाषा उसे ही कहते है ,जो बोली और सुनी जाती हो,और बोलने का तात्पर्य गूंगे मनुष्यों या पशु -पक्षियों का नही ,बल्कि बोल सकने वालेमनुष्यों से अर्थलिया जाता है। इस प्रकार -

"भाषा वह साधन है, जिसके माध्यम से हम सोचते है तथा अपने विचारों को व्यक्त करते है।"
मनुष्य, अपने भावों तथा विचारों को दो प्रकार, से प्रकट करता है -

१.बोलकर (मौखिक) २. लिखकर (लिखित)

१. मौखिक भाषा :- मौखिक भाषा में मनुष्य अपने विचारों या मनोभावों को बोलकर प्रकट करते है। मौखिक भाषा का प्रयोग तभी होता है,जब श्रोता सामने हो। इस माध्यम का प्रयोग फ़िल्म,नाटक,संवाद एवं भाषण आदि में अधिक होता है।

२. लिखित भाषा:- भाषा के लिखित रूप में लिखकर या पढ़कर विचारों एवं मनोभावों का आदान-प्रदान किया जाता है। लिखित रूपभाषा का स्थायी माध्यम होता है। पुस्तकें इसी माध्यम में लिखी जाती है।

भाषा और बोली 
भाषा, जब कोई किसी बड़े भू-भाग में बोली जाने लगती है,तो उसका क्षेत्रीय भाषा विकसित होने लगता है। इसी क्षेत्रीय रूप को बोली कहते है। कोई भी बोली विकसित होकर साहित्य की भाषा बन जाती है। जब कोई भाषा परिनिष्ठित होकर साहित्यिक भाषा के पद पर आसीन होती है,तो उसके साथ ही लोकभाषा या विभाषा की उपस्थिति अनिवार्य होती है। कालांतर में ,यही लोकभाषा परिनिष्ठित एवं उन्नत होकर साहित्यिक भाषा का रूप ग्रहण कर लेती है। आज जो हिन्दी हम बोलते है या लिखते है ,वह खड़ी बोली है, इसके पूर्व अवधी,ब्रज ,मैथिली आदि बोलियाँ भी साहित्यिक भाषा के पद पर आसीन हो चुकी है। (हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में यहाँ देखें। )


हिन्दी तथा अन्य भाषाएँ
संसार में अनेक भाषाएँ बोली जाती है। जैसे -अंग्रेजी,रुसी,जापानी,चीनी,अरबी,हिन्दी ,उर्दू आदि। हमारे भारत में भी अनेक भाषाएँ बोली जाती है । जैसे -बंगला,गुजराती,मराठी,उड़िया ,तमिल,तेलगु आदि। हिन्दी भारत में सबसे अधिक बोली और समझी जाती है। हिन्दी भाषा को संविधान में राजभाषा का दर्जा दिया गया है।

लिपि
लिपि का शाब्दिक अर्थ होता है -लिखित या चित्रित करना । ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है,वही लिपि कहलाती है। प्रत्येक भाषा की अपनी -अलग लिपि होती है। हिन्दी की लिपि देवनागरी है। हिन्दी के अलावा - संस्कृत, मराठी, कोंकणी, नेपाली आदि भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती है।

व्याकरण
व्याकरण वह विधा है,जिसके द्वारा किसी भाषा का शुद्ध बोलना या लिखना जाना जाता है। व्याकरण भाषा की व्यवस्था को बनाये रखने का काम करते है। व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं अशुद्ध प्रयोगों पर ध्यान देता है। इस प्रकार ,हम कह सकते है कि प्रत्येक भाषा के अपने नियम होते है,उस भाषा का व्याकरण भाषा को शुद्ध लिखना व बोलना सिखाता है।

व्याकरण के तीन मुख्य विभाग होते है :-

१. वर्ण -विचार :- इसमे वर्णों के उच्चारण ,रूप ,आकार,भेद,आदि के सम्बन्ध में अध्ययन होता है। २. शब्द -विचार :- इसमे शब्दों के भेद ,रूप,प्रयोगों तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है। ३. वाक्य -विचार:- इसमे वाक्य निर्माण, उनके प्रकार, उनके भेद, गठन, प्रयोग, विग्रह आदि पर विचार किया जाता है।

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