गुरुवार, 1 नवंबर 2018

मेरी बात : परिचय का एक कारवां


प्रिय मित्रों और विद्‌यार्थियों,

आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है। यह ब्लॉग एक प्रयास है, जिसका उद्‌देश्य शिक्षक और विद्‌यार्थियों के मध्य एक सेतु बनाकर, कक्षा-शिक्षण को आधुनिक तकनीक के उपयोग द्‌वारा समाज और संस्कृति से जोड़ना है, जहाँ प्रत्येक विद्‌यार्थी अपने विचारों को एक-दूसरे से साझा कर सके। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हमने अपनी कक्षाओं को ज्ञान की प्रयोगशालाओं में परिवर्तित करने की कोशिश किया है ताकि हमारे ज्ञान, अनुभव और कौशल का सम्पूर्ण विकास संभव हो सके। जीवन में ज्ञान प्राप्ति का महत्त्व तब बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जब हमारे चारों ओर अज्ञानता का अंधेरा घना हो, क्योंकि अज्ञानता के अंधेरे में मानव का विवेक और उसकी इनसानियत के खत्म हो जाने का खतरा अधिक बढ़ जाता है। मानव के जीवन में आने वाली हर कठिनाई का सामना बुद्‌धि-बल से किया जा सकता है, क्योंकि ज्ञान के द्‌वारा हममें साहस, धैर्य, आत्मबल और तर्क-शक्ति का विकास होता है। इनसान जब आदिमकाल में जंगलों में रहता था और सभ्यता से बहुत दूर था तब उसने अपने बुद्‌धि और कौशल का इस्तेमाल कर आग, पहिया, पशुपालन, खेती आदि का विकास करते हुए परिवार, समुदाय, समाज, गाँव और शहर तक का लम्बा किन्तु सफल सफर तय किया।इनसानी सभ्यता के इस यात्रा में उसके ज्ञान, बुद्‌धि, कौशल और तर्क-शक्ति ने भरपूर सहयोग दिया। आज हम विज्ञान के युग में हैं और तकनीक ने मानव जीवन को अत्यंत सहज और आरामदायक बना दिया है किन्तु इनसानी दिमाग ने आराम नहीं लिया है। वह हर नए दिन के साथ नए आविष्कारों की खोज में लगा हुआ है ताकि इनसानी जीवन को और ज्यादा सुखद और सुरक्षित बनाया जा सके। आज के शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सूचना और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ गया है। पुस्तक जहाँ पहले ज्ञान का प्रमाणिक स्रोत और संसाधन हुआ करता था आज वहाँ तकनीक के कई साधन मौजूद हैं। आज विद्‌यार्थी किताबों की श्याम-श्वेत दुनिया से बाहर निकलकर सूचना और तकनीक की रंग-बिरंगी दुनिया में पहुँच चुका है, जहाँ माउस के एक क्लिक पर उसे दुनिया भर की जानकारी दृश्य रूप में प्राप्त हो जाती है। एक शिक्षक होने के नाते यह हमारी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि हम समय के साथ खुद को ढालें और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सुचारू रूप से गतिशील बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक के साधनों का भरपूर प्रयोग करें।


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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत एक से लिखा ही।मुझे लगता है कि पाटशालाओ में विद्यार्थियों को मुस्किलाओ का सामना करना सिखाना चाहिए।

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  2. मुझे लगठा है पाटशालाओ ही सिर्फ़ पड़ना और खेल कूद नहीं सिखाना चाहिए, बच्चों को नई वस्तु बनाना चाहिए जिसे समाज कि सेवा हो।ऐसे कुछ सिखाना चाहिए और क्लब ऐक्टिविटीज़ भी रखना चाहिए जिसे बच्चे सुर भी सिक सकते है।

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