भूले बिसरे चित्र



कहते हैं कि पुराने दिन किताब के उन पन्नों की तरह होते हैं, जहाँ मन बार - बार लौटने को होता है। पर ठहर कहाँ पाता हूँ वहाँ! पीले ज़र्द से पड़े पन्नों से कईं कहानियाँ झाँकती हैं। मैंने कई बार कोशिश की है कि उन झाँकती कहानियों से कुछ कह सकूँ। कुछ और नहीं, तो यही कह दूँ कि याद तो आती है, तुम्हारी और इतनी कि अब अपने पाठकों से भी साझा कर रहा हूँ।

"किताबों से कभी यूँ गुज़रों तो कुछ किरदार मिलते हैं" -- गुलज़ार

१) मन धुआँ धुआँ -- कहानी - मालती जोशी।
(निर्देशन - गुलज़ार, संगीत - जगजीत सिंह)

२) सनसेट बुलेवार्ड -- कहानी - गुलज़ार।
(निर्देशन - गुलज़ार, संगीत - जगजीत सिंह)
भाग - १  

भाग - २ 


3) आलाँ -- कहानी - अहमद नदीम क़ासमी
"लेकिन लगता है, हम दोनों ही दहलीज पर खड़े हुए हैं। बार - बार एक पाँव बाहर निकाल लेते थे और अंदर खींच लेते थे।... ... चाहने और न चाहने के बीच खींची हुई यह लकीर चाकू की धार से भी ज्यादा तेज होती है। ... ... प्यार भी कर लेती हूँ, पर तुमने तो देखा ही नहीं।"
(निर्देशन - गुलज़ार, संगीत - जगजीत सिंह) 

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