अपठित गद्यांश

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए। उत्तर यथासंभव आपके अपने शब्दों में होने चाहिए - 


1

 
किसी अमीर के घर में एक दिन धुँआसा साफ करने के लिए एक मजदूर लड़के को बुलाया गया। लड़का सफाई करने लगा। वह जिस कमरे का धुँआसा उतार रहा था, उसमें तरह-तरह की सुंदर चीजें सजी रखी थीं। उन्हें देखने में उसे बड़ा मजा आ रहा था। उस समय वह अकेला ही था, इसलिए प्रत्येक चीज को उठा-उठा कर देख रहा था। इतने में उसे एक बड़ी सुंदर हीरे-मोतियों से जड़ी हुई सोने की घड़ी दिखाई दी। वह घड़ी को हाथ में उठाकर देखने लगा।


घड़ी की सुंदरता पर उसका मन लुभा गया। उसने कहा – ‘काश!  ऐसी घड़ी मेरे पास होती।’ उसके मन में पाप आ गया, उसे घड़ी चुराने का मन किया, परंतु दूसरे ही क्षण वह घबराकर चिल्ला उठा – ‘अरे रे! मेरे हृदय में यह कितना बड़ा पाप आ गया। चोरी करते हुए पकड़े जाने पर मेरी बहुत ज्यादा दुर्दशा होगी। जेल जाना पड़ेगा और लोग हिकारत की नज़र से मुझे देखेंगे। ईमान तो जायेगा ही लोग अपने घरों में घुसने तक न देंगे। मनुष्य पकड़े न पकड़े ईश्वर की नज़र तथा हाथ से तो कभी छूट नहीं सकता।’ यों कहते-कहते लड़के का चेहरा उतर गया, उसका शरीर पसीने-पसीने हो गया और वह काँपने लगा। वह सिर थामकर दीनभाव से जमीन पर बैठ गया। और आँखों से आँसुओं की धारा बह चली। कुछ समय बाद अपनी मानसिक स्थिति सामान्य हो जाने के बाद उसने घड़ी यथा स्थान रख दी। उसने जोर से कहा- ‘लालच बहुत ही बुरी चीज है। इसने ही मेरे मन को बिगाड़ा है, पर दयालु भगवान ने मुझको बचा लिया। लालच में फँसकर चोरी करने की अपेक्षा धर्म पर चलकर गरीब रहना बहुत अच्छा है।’ चोरी करने वाला कभी निर्भय होकर सुख की नींद नहीं सो सकता, चाहे वह कितना ही अमीर क्यों न हो। चोरी का मन होने पर जब इतना मानसिक क्लेश होता है तो चोरी कर लेने पर पता नहीं कितना भयानक कष्ट उठाना और दुख झेलना पड़ता।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    
 क) मजदूर लड़के को क्यों बुलाया गया? उसे अपना काम करने में मजा क्यों आ रहा था?  
ख) उसके मन में कब और क्यों पाप आया?  
ग) वह क्यों चिल्ला उठा और उसने अपने आप से क्या कहा?
घ) उसने किसका धन्यवाद किया और क्यों?
 ङ) ‘लालच’ के संबंध में उसके क्या विचार थे?

2


किसी का भी ह्रदय परिवर्तन सदा आकस्मिक रूप से ही होता है। अचानक ही कोई व्यक्ति सज्जन से दुर्जन बन जाता है और दुर्जन से सज्जन,पुण्यात्मा से पापात्मा बन जाता है या पापात्मा से पुण्यात्मा। इसका कारण है कि मन के कुछ सोए हुए संस्कार जाग्रत हो जाते हैं तो मानव का व्यवहार बिलकुल बदल जाता है। यह घटना द्वितीय विश्वयुद्ध के समय की है। एक व्यक्ति ब्रिटेन की शाही वायुसेना का अनुभवी चालक था। जब वह अपने बमवर्षक विमान पर सवार होकर शत्रु की सीमाओं पर बम बरसाता था तो ऐसा लगता था कि बमों के रूप में मानो मौत ही धरती पर उतर आई है।उस दिन भी वह सदा की तरह अपने काम पर निकला। उस दिन उसे केवल बम ही नहीं गिराने थे बल्कि अपने साथियों को रास्ता भी दिखाना था| उसने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया। उसके बमों की बरसात से मीलों लम्बे इलाके में कोई जीवित नहीं बचा| अपने हाथों हुए इस विनाश को देखकर उसकी आत्मा काँप उठी| उसके मुख से दुःख भरे शब्द फूट पड़े, “हे भगवन !हमने यह क्या किया ?और उसी समय उसने एक निर्णय ले लिया| विमान अड्डे पर लौटा| बधाइयों की ओर ध्यान न देते हुए, वह सीधा युद्ध कार्यालय गया और उसी समय अपने पद से त्यागपत्र दे दिया| घर जाकर उसने अपनी सारी संपत्ति बेच दी और उससे मिले पैसे से अनाथ बच्चों के लिए एक घर बनाया|
युद्ध से विमुख हुए इस चालक का नाम था – ग्रुप कैप्टन चैशामर और उसके द्वारा बनाया गया वह घर ‘चैशामर होम’ कहलाया| आज संसार के अनेक देशों में स्थापित ‘चैशामर होम’ अनाथ बच्चों को जीवनदान दे रहे हैं|

क) ह्रदय परिवर्तन का क्या परिणाम होता है?
ख) ब्रिटेन की शाही वायुसेना का अनुभवी चालक जब बम गिराता था, तो कैसा दृश्य हो जाता था?
ग) अपने हाथों हुए विनाश को देखकर वायुयान चालक ने क्या निश्चय किया?
घ) घर लौटकर विमान चालक ने क्या कार्य किया?
ङ) आज भी उस विमान चालक का नाम किस रूप में जीवित है?


3


जिंदगी की दो सूरतें हैं। एक तो यह कि आदमी बड़े-से-बड़े मकसद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अँधियाली का जाल बुन रही हों, तब भी वह पीछे को पाँव न हटाए। दूसरी सूरत यह है कि उन गरीब आत्माओं की हमजोली बन जाए जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुख पाने का ही संयोग है,क्योंकि वे आत्माएँ ऐसी गोधूलि में बसती हैं जहाँ न तो जीत हँसती है और न कभी हार के रोने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। ऐसे लोग बँधे हुए घाट का पानी पीते हैं और जिंदगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते। और कौन कहता है कि पूरी जिंदगी को दाँव पर लगा देने में कोई आनंद नहीं है? अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा हो तो फिर असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है। साहस की जिंदगी सबसे बड़ी जिंदगी होती है। ऐसी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह बिलकुल निडर,बिलकुल बेखौफ़ होती है। साहसी मनुष्य की पहली पहचान यह है कि वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तमाशा देखने वाले लोग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। जनमत की उपेक्षा करके जीने वाला आदमी दुनिया की असली ताकत होता है और मनुष्यता को प्रकाश भी उसी आदमी से मिलता है। अड़ोस-पड़ोस को देखकर चलना, यह साधारण जीव का काम है। ऐसे लोग अपने उद्देश्य की तुलना न तो पड़ोसी के उद्देश्य से करते और न अपनी चाल को ही पड़ोसी की चाल देखकर मद्धिम बनाते हैं। साहसी मनुष्य उन सपनों में भी रस लेता है जिन सपनों का व्यवहारिक अर्थ नहीं होता। जिंदगी को ठीक से जीना हमेशा ही जोखिम झेलना है और जो आदमी सकुशल जीने के लिए जोखिम का हर जगह पर घेरा डालता है, वह अंततः अपने ही घेरों के बीच कैद हो जाता है और जिंदगी का कोई मज़ा उसे नहीं मिल पाता है क्योंकि जोखिम से बचने की कोशिश में,असल में,जिंदगी को ही आने से रोक रखा है। जिंदगी से,अंत में हम उतना ही पाते हैं जितने की उसमें पूँजी लगाते हैं। यह पूँजी लगाना जिंदगी के संकटों का सामना करना है,उसके उस पन्ने को उलट कर पढ़ना है। जिसके सभी अक्षर फूलों से नहीं,कुछ अंगारों से भी लिखे गए हैं। जिंदगी का भेद कुछ उसे ही मालूम है जो यह जानकर चलता है कि ज़िदगी कभी भी खत्म न होने वाली चीज़ है।


क) साहस की जिंदगी कैसी होती है?
ख) जिंदगी की कौन सी दो सूरते हैं?
ग) जनमत की उपेक्षा करके जीने वाले व्यक्ति की पहचान क्या है?
घ) सकुशल जीने के लिए जोखिम उठाना पड़ता है। स्पष्ट कीजिए।


(टंकन - अंजना वाही)

4



माँ को अपने बेटे, साहूकार को अपने देनदार और किसान को अपने लहलहाते खेत को देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद-भजन के बाद जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। यह घोड़ा बड़ा सुंदर और बलवान था। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे सुल्तान कहकर पुकारते थे, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख – रेख कर प्रसन्न होते थे। ऐसी लगन, ऐसे प्यार, ऐसे स्नेह से कोई सच्चा प्रेमी अपने प्यारे को भी न चाहता होगा। उन्होंने अपना सब कुछ छोड़ दिया था – रुपया माल, असवाब, ज़मीनें, यहाँ तक कि उन्हें नागरिक जीवन से भी घृणा थी। वह एक गाँव के बाहर एक छोटे से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे, परंतु सुल्तान के बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असहनीय थी। “मैं इसके बिना नहीं रह सकूँगा” उन्हें ऐसी भ्रांति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते – “ऐसे चलता है जैसे मोर घनघटा को देखकर नाच रहा हो।"  गाँवों के लोग इस प्रेम को देखकर चकित थे। कभी – कभी कनखियों से इशारे भी करते थे; परंतु बाबा भारती को इसकी परवाह न थी। जब तक संध्या समय सुल्तान पर चढ़कर आठ – दस मील तक चक्कर लगा नहीं लेते थे, उन्हें चैन न आता।

क) बाबा भारती का घोड़ा कैसा था?
ख) बाबा भारती का घोड़े के प्रति स्नेह कैसा था?
ग) उनके लिए क्या असहनीय था और क्यों?
घ) गाँव के लोग क्या करते थे और क्यों?
ड़) बाबा भारती को कब चैन आता था?

(टंकन - सरिता सरकार)

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें